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वर्तमान में चल रहीं परियोजनाएं

भूमि अवक्रमण मानचित्रण 1ः50,000 मापक पर (द्वितीय चक्र)

भूमि अवक्रमण की प्रकृति गतिशील है एवं इसके शीघ्र परिवर्तन एवं इन परिवर्तनों के कारणों को समझने के लिये इनकी नियमित देख-रेख किया जाना आवश्यक हैं। भूमि अवक्रमण के इन परिवर्तनो के लिये प्रति 10 वर्षो में देख-रेख कार्य किया जाना उपयुक्त हैं।

राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र, अंतरिक्ष विभाग, भारत शासन द्वारा विभिन्न राज्यों, भारत शासन के विभिन्न विभागों एवं संस्थानों के सहयोग से वर्ष 2005-06 के LISS-III उपग्रह छायाचित्रों का उपयोग कर 1ः50,000 मापक पर राष्ट्रीय भूमि अवक्रमण मानचित्रण (प्रथम चक्र) का कार्य पूर्व में पूर्ण किया गया हैं। वर्तमान में राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र, अंतरिक्ष विभाग, भारत शासन द्वारा प्रायोजित इस परियोजना के अंतर्गत पूर्व में बनाये गये भूमि अवक्रमण मानचित्र तथा 2015-16 के LISS-III के तीनों सीजन के उपग्रह छायाचित्रों का उपयोग कर परिषद द्वारा संपूर्ण छत्तीसगढ़ के विभिन्न वर्ग के भूमि अवक्रमण मानचित्रण एवं भूमि अवक्रमण में परिवर्तन के विश्लेषण का कार्य किया जा रहा हैं।

राष्ट्रीय बंजर भूमि का 1ः50,000 मापक पर परिवर्तन विश्लेषण

शासन की किसी भी योजना तथा उसका विकास प्रारंभ करने के लिये बंजर भूमि की भू-स्थानिक सीमाओं का विश्वसनीय डाटाबेस अपेक्षित होता हैं।

राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र, अंतरिक्ष विभाग, भारत शासन, द्वारा विभिन्न राज्यों, भारत शासन के विभिन्न विभागों एवं संस्थानों के सहयोग से वर्ष 2005-06 एवं 2008-09 के मध्य LISS-III उपग्रह छायाचित्रों के आधार पर राष्ट्रीय बंजर भूमि परिवर्तन के विश्लेषण का कार्य पूर्व में पूर्ण किया गया हंै।

वर्तमान में राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र, अंतरिक्ष विभाग, भारत शासन द्वारा प्रायोजित इस परियोजना के अंतर्गत वर्ष 2015-16 के LISS-III के तीनों सीजन के आॅर्थोरेक्टीफाइड उपग्रह छायाचित्रों का उपयोग कर संपूर्ण छत्तीसगढ़ के बंजर भूमि के मानचित्रों का नवीनीकरण किया जा रहा हैं।

भूमि उपयोग, भू आवरण 1ः50000 मापक पर मानचित्रण (तृतीय चक्र)

राष्ट्रीय एवं राज्य शासन की किसी भी योजना, परियोजना तथा उसका विकास प्रारंभ करने के लिये भूमि उपयोग, भू-आवरण का समय-समय पर कालिक परिवर्तन तथा सीमाओं का विश्वसनीय डाटा बेस अपेक्षित होता है।

राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र अंतरिक्षत विभाग, भारत सरकार, द्वारा प्रायोजित इस परियोजना के अंतर्गत छत्तीसगढ़ के समस्त 27 जिलों के भूमि उपयोग, भू-आवरण मानचित्रण 1ः50,000 मापक पर तैयार किये जा रहे हंै। यह डाटा बेस राज्य सरकार एवं भारत सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा नगरीय विकास योजना, पर्यावरण, सिंचाई, वन एवं उद्योग आदि क्षेत्रों में उपयोग हेतु भुवन पोर्टर पर उपलब्ध होंगे।

यह परियोजना राष्ट्रीय सूदूर संवेदन, अंतरिक्ष विभाग, भारत सरकार द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के सेसंस (एन.आर.सी.) के अंतर्गत प्रायोजित है। इस परियोजना में वर्ष 2015-16 के तीनों ऋतुओं-खरीफ, रवि और जेड के LISS-III आर्थोरेक्टीफाईड् उपग्रह चित्रों का उपयोग कर 1ः50,000 मापक पर छत्तीसगढ़ राज्य के सभी 27 जिलों के भूमि उपयोग, भू-आवरण मानचित्र तैयार किये जा रहे है। यह मानचित्रण विभिन्न उपयोगी संस्थाओं की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भूमि उपयोग, भू-आवरण के राष्ट्रीय स्तर में वर्गीकरण प्रणाली पर आधारित है।

एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम (आई. डब्ल्यु. एम. पी.) परियोजनाओं की जियोस्पेशियल तकनीकी द्वारा निगरानी

राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केन्द्र, अंतरिक्ष विभाग, भारत शासन, द्वारा प्रायोजित इस परियोजना के अंतर्गत जलप्रणाली लेयर, आर्थोरेक्टीफाइड हाई रिजोल्युशन उपग्रह छायाचित्र LISS-IV एवं कार्टोसेट, भुवन सर्विसेज तथा मोबाईल ऐप का उपयोग कर माइक्रोवाटरशेड सीमाओं में सुधार एवं छत्तीसगढ़ में वर्ष 2009-10 से 2014-15 तक स्वीकृत आई. डब्ल्यु. एम. पी. परियोजनाओं केे अंतर्गत किये गये कार्यो की निगरानी एवं मूल्यांकन का कार्य किया जा रहा हैं। प्रत्येक आई. डब्ल्यु. एम. पी. परियोजना के कार्यों की निगरानी एवं मूल्यांकन, परियोजना कार्यान्वयन की तिथि से 5 वर्ष की अवधि तक किया जायेगा। इस निगरानी एवं मूल्यांकन कार्य में आई. डब्ल्यु. एम. पी. परियोजनावार 5 वर्षों के भू-उपयोग एवं भू-आवरण मानचित्रों, वेजीटेशन इन्डेक्स का जियोडाटाबेस, एवं इसरो द्वारा विकसित “दृष्टि“ मोबाईल एप की सहायता से एकत्रित भुमि सत्यापन का उपयोग किया जा रहा हैं।

सेरीकल्चर का विकास में सुदूर संवेदन एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली के उपयोग-(द्वितीय चरण)

यह परियोजना उत्तर-पूर्व अंतरिक्ष उपयोग केन्द्र, अंतरिक्ष विभाग, भारत सरकार द्वारा प्रायोजित एवं केन्द्रीय रेशम बोर्ड के सहयोग से पूर्ण किया जा रहा हैं। इस परियोजना के अंतर्गत छत्तीसगढ़ के सरगुजा एवं बलरामपुर जिलें में रेशम विकास हेतु उपयुक्त शहतूत बागान क्षेत्रों का चिन्हांकन, उपग्रह छायाचित्रों के विश्लेषण एवं चयनित भूमि सत्यापन के आधार पर, 1ः10,000 मापक पर मानचित्रकरण किया जा रहा है तथा सेरीकल्चर इन्फरमेशन लिंकेज एण्ड नाॅलेज सिस्टम (सिल्क) नामक वेब पोटल तैयार किया गया है। रेशम विकास हेतु उपयुक्त ग्राम, पंचायत, विकासखंड के नाम एवं क्षेत्रों के आंकलन सहित प्रतिवेदन तथा जिलेवार मानचित्रण प्रस्तुत किये जायेंगे। इस परियोजना के कार्य से रेशम विकास अधिकारी, जमीनी स्तर के रेशम उत्पादक कृषक, स्व-सहायता समूहों, बैंक और सहकारी समितियाॅ, राज्य शासन के रेशम संचालनालय, केन्द्रीय सिल्क बोर्ड के क्षेत्रीय विकास कार्यालय एवं केन्द्रीय अनुसंधान प्रयोगशालायें लभांन्वित होंगे।

फसल परियोजना

राष्ट्रीय फसल पुर्वानुमान केन्द्र (MNCFC)] कुषि एवं कृषक कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त है। इस परियोजना का उद्देष्य धान फसल (खरीफ) कटाई के पूर्व क्षेत्र एवं उत्पादन के आकलन का कार्य किया जाना है। उक्त परियोजना में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) व राज्य के सुदूर संवेदन केन्द्र के वैज्ञानिक एवं कृषि विभाग, समूह के रुप में कार्य कर रहा है।

क्राॅप इंटेन्सीफिकेषन परियोजना

राष्ट्रीय फसल पुर्वानुमान केन्द्र (MNCFC), कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार, द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त है। इस परियोजना का उद्देष्य सुदूर संवेदन उपग्रहों एवं भौगोलिग सूचना प्रणाली तकनीक का प्रयोग कर धान फसल (खरीफ) की कटाई के उपरांत के पड़त भूमि का मानचित्रण व अनुश्रवण कर रबि उपज क्षेत्र का विस्तार करना है।

उच्च रिज़ॉल्यूशन उपग्रह चित्र के उपयोग से छत्तीसगढ़ राज्य के गंभीर सूखा प्रभावित गांवों में भू-जल विकास के लिए संभावित क्षेत्रों की पहचान (1: 10,000 मापक पर): पी.एच.ई. डी विभाग हेतु।

राजनांदगांव जिले के 154 सुखाग्रस्त ग्रामों में भूजल विकास कार्य हेतु 1ः10,000 स्केल में उच्च क्षमता वाले उपग्रह चित्रों की सहायता से नये स्त्रोतों का चिन्हांकन छत्तीसगढ़ राज्य के ग्रीष्मकाल के दौरान पेयजल स्त्रोतों का सूख जाना एक समस्या है जिसके कारण प्रधानमंत्री द्वारा देश के कई राज्यों की सूखे की स्थिति का अवलोकन उपरांत अंतरिक्ष आधारित प्रौद्योगिकी का उपयोग भूजल स्त्रोतों के चिन्हांकन हेतु विशेष जोर दिया गया। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा राजनांदगांव जिले के सूखाग्रस्त ग्रामों में भूजल स्त्रोतों के 1ः10,000 स्केल पर चिन्हांकन करके एवं मानचित्र बना कर कार्य किया जा रहा है। जिसकी सहायता से स्त्रोतों के निर्माण से ग्रामीण अंचलों में भूजल वितरण की समस्या से बचाया जा सकेगा।

"नीचे दिये गए शीर्षकों के लिए वर्तमान में जानकारी उपलब्ध नहीं हैं यह जानकारी अंग्रेजी में प्राप्त करने के लिए अंग्रेजी पृष्ठ पर जाएँ।"

पंचायतीराज संस्थानों को सशक्त बनाने के लिए स्पेसियल सपोर्ट (ई.पी.आर.आई.एस)

एन.आर.एस.सी, इसरो, भारत सरकार के सहयोग से : आर.जी.एन.डी.डब्लू.एम के तहत भूजल गुणवत्ता मैपिंग (1: 50,000 मापक पर)

बहिर परिसर आउटरीच प्रशिक्षण कार्य

सीकल सेल एटलस निर्माण

भुवन स्टेट नोड का विकास करना

राज्य के लिए आकाशीय बिजली सेंसर नेटवर्क प्रणाली का संचालन

1: 10,000 पैमाने पर ग्रामों के खसरा नक्शों का ट्रांसफॉर्मेशन एवं जिओ-रिफ्रेंसिंग

वन विभाग के लिए राज्य की वेटलैंड इन्वेंट्री

लौह अयस्क ब्लॉकों में पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययन

उच्च रिज़ॉल्यूशन उपग्रह चित्र के उपयोग से धरसाओ सिंचाई परियोजना हेतु कमांड क्षेत्र में नहरों का संरेखण

पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के आई.डब्ल्यू.एम.पी परियोजना को तकनीकी सहायता।

मनरेगा पर्यावरण लाभ कार्यक्रम (GiZ) के लिए तकनीकी सहायता

छत्तीसगढ़ राज्य के नवीन एवं विद्यमान भूमि पट्टों के भूमि निर्धारण हेतु डी.जी.पी.एस. सर्वेक्षण

विलेज इन्फाॅरमेशन सिस्टम

खनिज नलकूपों के लिए वेब आधारित पोर्टल का निर्माण

पटवारी नक्शों का डिजीटाइजेशन एवं जिओ-रिफ्रेंसिंग

उपलब्धियां

  • स्टेट मीट आॅन प्रोमोटिंग स्पेश टेक्नोलाॅजी बेस्ड टूल्स एण्ड एप्लीकेशन इन गवर्नेन्स एण्ड डेवल्पमेंट।
  • ईयर आॅफ सांईनटिफिक अवेयनेस-2004।
  • वीनस ट्रानसिट-2004।
  • रीजनल ओरीएनटेशन वर्कशाॅप आॅन माइक्रोआरगेनिजमसः लेट अस ओबसर्व एण्ड लर्न।